Links Contact Us About us Terms Add feedback Invite a friend
Home Members Music Blogs Photos Classifieds Events Forums Articles chat
Articles
बङगङां बङगङां बङगङां -2
03-21-10

भाग १ से आगे .... ' महाराणा ! मेवाड़ के सरदार आए है , आपके चरणों का कुशल पूछने |' 'उन्हें कह दो लौट कर चितौड़ चले जाएँ और कुशल पूछें अपनी आयु और परिवार का | मुझपर सारंगदेव का अहसान था | पृथ्वीराज और जयमाल ने मुझ पर आक्रमण किया था तब उस स्वामिभक्त साथी ने उसके वार को अपने ही सिर पर ले लिया | अपने पुत्र लिम्बा को उसने मेरे लिए खोया | शरीर पर ३५ घाव लगे और अंत में बाठरडे देवी मंदिर में कपट से पृथ्वीराज के हाथों मारा गया | मेरी स्वामिभक्ति उसे कितनी महंगी पड़ी , पर मै अभागा तो अपने हित चिंतकों के अहसान भी नहीं उतार सका | इन कायर सदारों ने मेरी आयु पर डाका डाल दिया | काश ! मै स्वामिभक्त सारंगदेव की समाधी पर दो आंसू ही बहा सकता ! जाओ सरदारों ! मेवाड़ के मगरों पर खरगोशों की शिकार खेलो ! देखो , बचो , बचो ! किसी घोड़े की फेंट में आ गए तो यही रह जावोगे | यहाँ घोड़े दौड़ रहे है -घोड़े ! खानवा के युद्ध क्षेत्र में दौड़ते जा रहे है '- बङगङां बङगङां बङगङां | 'मेवाड़ जैसी पवित्र भूमि पर तुम्हारे जैसे कायर सरदारों के पाप को मैंने अपने शरीर पर लगे अस्सी घावों के रक्त से धोने की चेष्टा की है | परिस्थितियां चाहे किसी प्रकार की हों मुझे निराश नहीं कर सकती | मेरी एक आँख गई , एक हाथ कटा , एक पैर कटा , एक पैर टूटा परन्तु मेरा दिल नहीं टूटा | मैंने असम्भव को संभव कर दिया , सिंहों को साथ कर दिया ,बिछुड़े हुओं को मिलाकर अनेकों को एक कर दिया | परन्तु अफ़सोस .............! इतना कहकर महाराणा सहसा कराहने लगे | बड़ा मार्मिक था उनका कराहना | आँखों में एक आंसू छलक कर बहने की तैयारी करने लगा | ' क्यों अन्नदाता ! किसी घाव में पीड़ा हो रही है क्या ? आपकी आँख का यह आंसू कहीं आपकी महानता ..............|' मेरे शरीर पर तो ऐसी कोई जगह नहीं बची है जहाँ घाव नहीं हो | पर आज एक नया घाव उभर आया है | उस घाव में खून नहीं नहीं निकल रहा है . पानी निकल रहा है पानी ,और उस पानी से मेरे अरमानों की तस्वीर गल गल कर आँखों में आ रही है | वह देखो , विभीषण जा रहा है | तीस हजार घुड सवारों के साथ बड़ी बेशर्मी से बाबर की और जा रहा है और खानवा के युद्ध क्षेत्र में उसके देशद्रोही घोड़े दौड़ रहे है '- बङगङां बङगङां बङगङां | महाराणा की आँख का उमड़ा हुआ आंसू हिम्मत कर आखिर ढुलक ही पड़ा | 'अन्नदाता ! हिम्मत मत हारिये | महाराणा ने झट से विवशता को पोंछ डाला | बोले - ' हाँ ,ठीक कह रहे हो ! मै हिम्मत कैसे हारूँ | यह कठिन समय मेरी हिम्मत की परीक्षा का समय है | अब मुझे खुद को लड़ना है | लाओ मेरा घोडा | इस पर तो जीन भी नहीं है | परवाह नहीं | यह लो सवार हो गया | अब खानवा के युद्ध क्षेत्र में महाराणा संग्राम सिंह का घोडा दौड़ेगा | ' राणा सांगा शय्या त्याग कर एक घुड़सवार से झूमते दौड़ने लगे | लोगों ने दौड़कर बड़ी कठिनाई से उन्हें पकड़ लिया क्रमश:.......... Read more: http://www.gyandarpan.com/2010/01/2_19.html#ixzz0io7MZByT

Copyright@2007Ravindra Shekhawat
God does not care about our mathematical difficulties. He integrates empirically.
Albert Einstein